Answer :

मेरा व्यवहार श्रीराम के व्यवहार जैसा होता यानि गोस्वामी तुलसीदास जी की प्रस्तुत रचना में मैं अपने आप को श्रीराम के रोल में रखता। यहां मैं अपने छोटे भाई लक्ष्मण को उदंडता करते हुए देखने पर स्थिति को बिगड़ने से पहले ही श्रीराम की तरह बीच में पड़कर स्थिति को और बिगड़ने से पहले ही रोक देता। मैं बिल्कुल श्रीराम की तरह वह करने का प्रयास करता जो करने में लक्ष्मण जी चूक गये। कहने का अर्थ है मैं युक्तिपूर्ण ढंग से परशुरामजी की बातों का इस प्रकार से उत्तर देता कि वे शांत हो जाते नाकि लक्ष्मण जी की तरह का व्यवहार कर यानि व्यंगोक्ति कर उनके गुस्से को और अधिक भड़काता| मैं श्रीराम के लहजे में परशुरामजी की कम से कम उम्र का ध्यान रखता और उनसे फालतू में ना उलझता। मैं परशुरामजी से शिव धनुष तोड़ने की माफी मांग लेता और उनसे धनुष टूटने की परस्थिति के कारणों पर उनसे चर्चा करता और किसी सकारात्मक निष्कर्ष पर पहुंचने की कोशिश करता। मैं श्रीराम की तरह परशुरामजी से लक्ष्मण का उनका गुस्सा भड़काने को लेकर क्षमा मांगकर उनके ना मानने पर लक्ष्मण को उनसे क्षमा मांगने को कहता। हालांकि मुझे पूरी उम्मीद है कि ऐसा करने से पहले ही परशुराम जी का क्रोध शांत हो जाता और वे मेरे क्षमा मांगने पर मेरे छोटे भाई लक्ष्मण को क्षमा कर देते।


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