Answer :

) जिस प्रकार गहरी नदी में भंवर उठता है तो सब कुछ उसमें समा जाता है। सब कुछ उसके अन्दर फंस के रह जाता है। ऐसे ही मन रूपी नदी में यादों का भंवर उठता है और सब कुछ नष्ट कर देता है। मनुष्य को सिवाय दुख के कुछ नहीं मिलता। मनुष्य अपने अतीत की यादों में फंसकर रह जाता है इसके सिवाय इससे कुछ भी हासिल नहीं होता|


) जब यादें आती है तो मनुष्य का मन विचलित हो जाता है। उसे कुछ भी अच्छा नहीं लगता है। निराशा और दुख के भाव उसे घेर लेते हैं। उससे तनाव उत्पन्न होता है जो एक जानी दुश्मन की तरह कार्य करता है।


) शरीर में धंसा कांच शरीर को रहरहकर दर्द देता है। घाव हो जाता है। ऐसे ही यादें भी घाव की तरह होती हैं जो मनुष्य को रहरहकर दर्द देती रहती हैं। मनुष्य चैन से नहीं रह पाता, दोनों का साम्य इस तरह से बैठाया गया है।


) इस पंक्ति का आशय यह है कि हम यादों को कुछ कह नहीं सकते। वह जैसी भी हैं हमारी हैं। हमारा मन उन यादों में कहीं ना कहीं शामिल है। अगर हम यादों को भलाबुरा कह रहे हैं तो इसका आशय यह है कि हम खुद को भलाबुरा कह रहे हैं।


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