Answer :

लेखक ने समाज में बढ़ रहे उपभोक्तावाद पर चिंता व्यक्त की है। सुख पाने की होड़ में आज लोग उत्पादों पर निर्भर हो गए हैं। लोगों के लिए सुख की परिभाषा बदल गई है। लोग आंतरिक सुख से ज्यादा बाहरी दिखावे को ही सुख मानने लगे हैं। हमारी जरूरतों के लिए उत्पाद तैयार किए जाते हैं लेकिन लोग अपनी जरुरत पूरी करने के वजाय उसे वेजा उपयोग करने में आनंद अनुभव करते हैं| जानेअनजाने लोगों का चरित्र बदल रहा है। लेखक का मानना है कि उपभोग सुखही सुख नहीं हैं। संसार एवं मानव के जीवन में अन्य प्रकार के सुख भी हैं जैसे- शारिरिक, मानसिक और अन्य प्रकार के सूक्ष्म आराम| इन सभी को भी सुख की श्रेणी में रखकर इन्सान को मात्र उपभोक्तावाद से बचना चाहिए|


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