Answer :

इस पंक्ति से आशय है कि भक्त और ईश्वर इतने समीप आ जाते हैं कि भक्त के तन-मन में भक्ति का भाव प्रवेश कर लेता है। ईश्वर की भक्ति से उसका रोम-रोम प्रसन्न हो जाता है। इस पंक्ति में भी कवि अपने रोम-रोम में प्रभु के बसने की बात कह रहा है। भक्त के अंग-अंग में प्रभु की भक्ति की सुगंध उसके जीवन को महका देने में सहायक है।


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