Answer :

इस पूरे प्रसंग में व्यंग्य का अनूठा सौंदर्य हमें मिलता है। व्यंग्य की शुरुआत पाठ की तीसरी पंक्ति से ही होने लगती है-

सेवक सो जो करे सेवकाई। अरि करनी करि करिअ लराई।। कहने का अर्थ है सेवक वह है जो स्वामी की सेवा करता है। वह सेवक नहीं है जो हृदय में शत्रुता के भाव रखता है, वह तो शत्रु है।


दूसरे अवसर पर व्यंग्यपूर्ण बातों का क्रम तब देखने को मिलता है जब लक्ष्मण परशुराम से कहते हैं-


लखन कहा हसि हमरे जाना। सुनहु देव सब धनुष समाना।।


का छति लाभु जून धनु तोरें। देखा राम नयन के भोरें।। यहां लक्ष्मण जी परशुराम जी का उनसे धनुष टूटने के प्रश्न पर उत्तर देते हैं- श्री राम ने तो बाल्यकाल से अबतक खेल-खेल में न जाने कितने ही धनुष तोड़ डाले हैं। ये सारे धनुष एक समान से थे यानि कमजोर थे। आपका धनुष भी कमजोर था। इसमें भी श्रीराम को कोई नई बात नहीं दिखी। इस प्रकार यहां भी हमें व्यंग्य का अनूठा सौंदर्य देखने को मिलता है।


एक अन्य अवसर पर लक्ष्मण परशुराम के दंभ एवं गर्वोक्ति पर व्यंग्य करते हैं-


पुनि-पुनि मोहि देखाव कुठारू। चहत उड़ावन फूँक पहारू।।


इहाँ कुम्हड़बतिया कोउ नाहीं। जे तरजनी देखि मर जाहीं।।


× × × ×


कोटि कुलिस सम बचन तुम्हारा। ब्यर्थ धरहु धनु बान कुठारा।


यहां भी लक्ष्मण जी व्यंग्यपूर्ण बोली में परशुरामजी से कहते हैं- आप मुझे बार-बार अपना फरसा दिखा कर डरा रहे हैं। जैसे कि आप के अन्दर फूंक मारकर पहाड़ उड़ाने का बल मौजूद हो। वे फिर परशुरामजी से कहते हैं कि यहां कोई कुम्हरा का नया फूल नहीं है जो तर्जनी उंगली दिखाने मात्र ही से कुम्हला जाता है, मर जाता है। किसी को क्षति पहुंचाने हेतु आपके कटु वचन ही काफी हैं। फिर आपने वाणों को व्यर्थ में ही धारण कर रखा है।


एक अन्य अवसर पर लक्ष्मण की व्यंग्यपूर्ण बातें देखिए-


भृगुबर परसु देखाबहु मोही। ब्रिप विचारि बचौं नृपद्रोही।।


मिले न कबहूँ सुभट रन गाढ़े। द्विजदेवता घरहि के बाढ़े।।


यहां पर भी लक्ष्मण जी अपनी व्यंग्यपूर्ण वाणी में परशुरामजी के क्रोध को भड़काते हुए उनसे कहते हैं कि हे भृगुवंशी! आप मुझे अपना फरसा दिखा रहे हैं। मैं आपको ब्राह्मण जानकर विवश हूँ। आपने कई राजाओं को युद्ध में पराजित किया होगा, उनकी हत्या कर दी होगी। आपको कोई ठीक योद्धा आजतक मिला ही नहीं होगा सबके सब कमजोर होंगे। इस प्रकार हम पूरे प्रसंग में व्यंग्य का अनूठा सौंदर्य पाते हैं।


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