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सुदामा चरित नामक कविता का एकांकी में रूपांतरण

द्वारकाधीश श्रीकृष्ण की समृद्धि एवं खुशहाली से भरी नग, आलीशान और भव्य प्रसाद की चारों ओर महकती सगंध। प्रसन्नता एवं शांतिमय वातावरण। प्रसाद के बीच स्थित द्वारकाधीश श्रीकृष्ण का भवन। भवन के बाहर खड़े द्वारपाल। ऐसे में निर्धन सुदामा श्रीकृष्ण के भवन के सामने पहुँचते हैं। न उनके सिर पर पगड़ी है और न शरीर पर ढंग के कपड़े। धोती जगह-जगह से फटी हुई है। ऐसी स्थित में सुदामा द्वारपाल के पास जाते हैं।


सुदामा- (द्वारपाल से) अरे भाई द्वारपाल, क्या आप मुझे द्वारकाधीश श्रीकृष्ण केराजभवन का रास्ता बता सकते हैं?


द्वारपाल- तु्म्हारा नाम क्या है? कहाँ से आए हो? क्या काम है?


सुदामा- मेरा नाम सुदामा है और मै बहुत दूर से आया हूँ।


द्वारपाल- प्रभु श्रीकृष्ण का भवन यही है।


सुदामा- अपने प्रभु श्रीकृष्ण से कह दो कि उनसे मिलने सुदामा आया है।


द्वारपाल- ठीक है, तुम यहीं प्रतीक्षा करो हम तुम्हारा संदेश उन तक पहुंचाते हैं।


द्वारपाल- महाराज की जय हो! प्रभु, आपसे कोई निर्धन व्यक्ति मिलने आया है।


श्रीकृष्ण- कौन है वो व्यक्ति? कहां से आया है?


द्वारपाल- प्रभु उस व्यक्ति के हालात बहुत बदतर मालूम पड़ते हैं। न तो उसके सिर पर पगड़ी है और न तन पर ढंग के वस्त्र? अपना नाम सुदामा बता रहा है।


(सुदामा का नाम सुनते ही कृष्ण अपना राज सिंहासन छोड़कर सुदामा से मिलने राजमहल के द्वार पर पहुंचत हैं)


श्रीकृष्ण- सुदामा! मेरे मित्र यह क्या हाल बना रखा है। इतनी गरीबी के वक्त तुम पहले मेरे पास क्यों नहीं आ गए?


(सुदामा संकोचवश कोई जवाब नहीं देते। वे अपनी पत्नी द्वारा भेजे गए चावलों की पोटली को काँख के नीचे छिपाने का प्रयास करते हैं, जिसे कृष्ण देख लेते हैं।)


श्रीकृष्ण- मित्र, यह तुम क्या छिपा रहे हो। पोटली छीनते हुए कृष्ण कहते हैं- तुम भाभी के भेजे चावल मुझसे छिपा रहे थे।


(इसके बाद श्रीकृष्ण उसमें से कुछ चावल खा लेते हैं और सुदामा उनके यहाँ कुछ दिन बिताकर अपने गाँव वापस आने के लिए विदा होते हैं। हालांकि श्रीकृष्ण से भेंट के रूप मे सुदामा को कुछ नहीं मिलता और वह निराश वापस लौट आता है।)


सुदामा- (वापस लौटते हुए खुद से बातें करते हुए) कृष्ण ने तो दिखावे के लिए कितना कुछ किया। लेकिन एक बार भी यह नहीं सोचा कि भूखे ब्राह्मण को कभी घर से खाली हाथ विदा नहीं करते। अब जाकर अपनी पत्नी से कहूं- ये लो कृष्ण ने बहुत सारा धन दिया है। जरा संभालकर रखना।


(यही सोचते-सोचते सुदामा अपने गाँव पहुँच जाते हैं।)


सुदामा- अरे! अरे ये मैं कहां आ गया। यह तो एकदम द्वारका जैसा दिखता है। कहीं मैं किसी गलत दिशा में तो नहीं भटक गया।


सुदामा- (गाँव के एक व्यक्ति से) भाई, गरीब सुदामा की झोंपड़ी यहां कहां है?


ग्रामीण- अरे, सुदामा अब तक अपने ही राजमहल के सामने खड़े हो। तुम्हारी झोंपड़ी की जगह अब राजमहल बन गया है।


सुदामा- मैं अपने सच्चे मित्र की मित्रता से कितना अंजान था।


विद्यार्थी एकांकी का अभिनय स्वयं करें।


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