Answer :

अंत में कवि ईश्वर से यह प्रार्थना करते हुए अनुनय करता है कि भले ही ईश्वर उनके भार को कम न करें और उन्हें सांत्वना भरे दो बोल ना मिलें। वह ईश्वर से इसे अपने लिए अपेक्षित नहीं मानता हैँ। कवि को इससे ‘आत्मत्राण’ या मन की शांति प्राप्त नहीं होती है। वह ईश्वर से अपने लिए सिर्फ इतना चाहता है कि वह विपदाओं से सामना करते हुए भयमुक्त रहे। वह सुख के क्षणों में ईश्वर के समक्ष अपना सर नीचा रखकर अहंकार रहित होकर उनका प्रतिदिन स्मरण करना चाहता है। दुख के क्षणों में भी कवि करुणामय ईश्वर के उपर अविश्वास नहीं करने की ईश्वर से प्रार्थना करता है। कहने का अर्थ है कि कवि ईश्वर से सुख के क्षणों में उन्हें अहंकार वश ना भूलने का आशीर्वाद मांगता है और साथ में दुख में उनका धैर्य बनाये रखने की कवि ईश्वर से प्रार्थना करता है। मूल रूप से वह यह कहना चाहता है कि उसका ईश्वर पर हमेशा विश्वास बना रहे|


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