Q. 12 C4.8( 10 Votes )

Answer :

                                                                                                                       अपने लिए जिए, तो क्या जिए
प्रस्तावना— अपने लिए जिए
, तो क्या जिए। इस वाक्य का अर्थ है निस्वार्थ भाव से लोगों की सेवा करने को ही परोपकार कहा जाता है| जब हम बिना किसी मतलब और दूसरों से बिना कोई अपेक्षा किये उनके लिए कुछ करते हैं तो हमारे द्वारा किया गया ऐसा कार्य परोपकार की श्रेणी में आता है| परोपकार का सबसे अच्छा उदाहरण है प्रकृत्ति। परोपकार की भावना को समझने के लिए प्रकृति से बेहतर उदाहरण कोई दूसरा हो ही नहीं सकता है प्रकृति के कण-कण में परोपकार की भावना है। जैसे धरती, समुद्र, वृक्ष, आकाश और नदियां मानव जातिको बहुत कुछ दे रहे हैं लेकिन  इसके बदले में वे हमसे कुछ नहीं लेते| 


मनुष्य में बढ़ती स्वार्थपरता—  सभी सांसारिक जीवों में मनुष्य को सर्वश्रेष्ठ माना जाता है क्योंकि उसमें परोपकार की भावना होती है।  उसके पास दिल और दिमाग है और वह दूसरों का भला कर सकता है| मनुष्य एक भावनात्मक प्राणी है| परन्तु आज लोगों में ये भावना समाप्त होती जा रही है। मनुष्य अपने स्वार्थ के लिए दूसरों को ही नहीं बल्कि प्रकृत्ति को भी नुकसान पहुंचाने से नहीं चूकता है। लोगों में स्वार्थ आने का सबसे बड़ा कारण है लालच। लालच की भावना के मनुष्य में आ जाने के कारण एक स्थिति में तो वह दूसरे का जीवन लेने से भी नहीं सोचते। इसीलिए मनुष्य आज दुखी रहता है। पपरोपकार करने वाले व्यक्ति को समाज में प्रतिष्ठा,सम्मान और आंतरिक शान्ति प्राप्त होती है और वह व्यक्ति बड़े आराम से शांतिपूर्ण एवं सुखी जीवन व्यतीत कर सकता है|


परोपकार की प्रकृति और पूर्वजों की सीख— हमारे पूर्वजों ने स्वार्थ से परे रह परोपकार किया और आने वाली पीढ़ियों के लिए उदाहरण स्थापित किये ताकि वे भी परोपकार की भावना को सीख एवं अपना सकें| बचपन से हमने अपने पूर्वजों की ईमानदारी एवं परोपकार के कई पाठ पढ़े होंगे| परोपकारी व्यक्ति में सदाचारी आदि गुण अनायास ही आ जाते हैं। वह इतिहास-पुरुष बन जाता है। परोपकार की भावना हमें प्रकृति से मिली है। प्रकृति के चांद, सूरज, नदियां,वृक्ष सभी तो परोपकार के प्रतीक है। परोपकार मानव के लिए भी सबसे बड़ा धर्म है। परोपकार के कारण ही हम स्वार्थ जैसी तुच्छ भावना से दूर रहते हैं। परोपकार करने से हमारी हानि नहीं बल्कि हमें लाभ ही होता है।


मानव जीवन की सार्थकता— मनुष्य प्रकृति की सर्वश्रेष्ठ कृति है क्योंकि वह एक विवेकशील प्राणी है और वह अपने कार्यों से दूसरों के जीवन में बड़ा बदलाव ला सकता है, दूसरों का भला कर सकता है| मनुष्य में बुद्धि होती है जो उसे अच्छे और बुरे की पहचान करने की शक्ति प्रदान करती है| मानव का जीवन तभी सार्थक हो सकता है जब वह स्वार्थ छोड़ दूसरों का परोपकार करे। ऐसी लम्बी आयु जीने का क्या फायदा यदि वह उत्तम कार्यो के लिए उपयोग में नहीं लाई जा सकती। हमारे जीवन और समाज की बहुत सी समस्याओं का समाधान इंसानियत से हो सकता है। मानवीय व्यवहार से हो सकता है। एक मात्र मानव जीवन ही वह अवसर है, जिसमें हम जो भी चाहें प्राप्त कर सकते हैं। हमारा मुख्य उद्देष्य होना चाहिए कि मानव कल्याण के लिए जो भी श्रेष्ठ हो, पूर्णता प्राप्त का प्रयास करें। ऐसा न करके हमारा जीवन निष्फल और अर्थहीन होगा। ऐसे जीवन में कोई गुणवत्ता नहीं होगी।


उपसंहार— मनुष्य जीवन एक मधुर और अमूल्य ईष्वरीय देन है जिसे हमें व्यर्थ की बातों में नहीं गवाना चाहिए क्योंकि अंत में मनुष्य के द्वारा किये गए अच्छे और बुरे कार्य ही रह जाते है| अगर हमने अपने सम्पूर्ण जीवन में अच्छे कार्य और किसी का भला किया तो समाज हमें हमारे उन कार्यों के लिए याद रखेगा और बुरे कार्य किये तो वैसे याद रखेगा|गांधी, सुभाष चन्द्र बोस आदि महापुरुषों को उनके समाज के लिए किये गए बेहतरीन कार्यों के लिए याद किया जाता है| अतः हमें भी समाज के लिए अच्छे कार्य करने चाहिए ताकि हमारे पृथ्वी को छोड़ने के पश्चात भी समाज हमारे कार्यों को याद रखे| 

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